Tuesday, July 22, 2008

सबसे बडा लोकतंत्र, वोटतंत्र या नोटतंत्र ?



२२ जुलाई २००८ का दिन भारतीय लोकतंत्रीय इतिहास का सबसे काला दिन। भारतीय लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में बहस चल रही होती है।संप्रग सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह द्वारा पेश किये गये विश्वास मत पर बहस। अचानक चारो ओर नोट ही नोट दिखाई देखने लगते हैं। १००० -१००० के नोटो के बंडल लोकसभा अध्यक्ष के सामने की टेबल पर फैला दिये जाते हैं। आरोप, कि ये पैसे सांसदों को खरिदने के लिये दिये गए ताकि वे संसद से अनुपस्थित रहें या सरकार के समर्थन में वोट दे। सारे देश का सर शर्म से झुक जाता है। अपने जनप्रतिनिधियों की इस हरकत पर।पिछले कुछ दिनों से ये बार बार आरोप लगते रहा था कि सौदेबाजी हो रही है।हार्स ट्रेडिंग हो रही है। प्रधानमंत्री कहते हैं, सबूत पेश करो। अगले ही दिन यानि २२ जुलाई दिन मंगलवार शाम के चार बजे विपक्षी पार्टी भाजपा के तीन सांसद संसद भवन में एक बैग लेकर आते हैं। कहते हैं, " यह है सबूत।" फिर दिखता है, कि कैसे हमारा सबसे बडा लोकतंत्र नोट्तंत्र में बदल चुका है। कहते हुए शर्म आती है कि हम सबसे बडे लोकतंत्र हैं। सब कुछ साफ साफ दिखता है। कैसे और क्या हो रहा है। तो सवाल ये उठता है, कि क्या हम इससे भी निचे गीर सकते हैं? क्या यही है लोकतंत्र ? न्यूक डील हो या ना हो ...सरकार रहे या ना रहे, लेकिन क्या फैसला इस तरह से होना ही लोकतंत्र की निशानी है ? भारत की जनता पूछ रही है, लेकिन इसका जवाब कौन देगा...

Thursday, July 3, 2008

इंसानियत के नाते


इनसे मीलिये.ये हैं जुगल केवट और मुरलीधर केवट. मध्यप्रदेश के टिकमगढ ज़िले के जतारा प्रखंड में बंधा गांव के रहने वाले ये दोनो भाई आज एक मिसाल बन गये हैं। जब पूरा बुंदेलखंड पीने के पानी के लिये तरस गया था इन भाईयों ने गांववालों को पानी पिलाने के लिये ना सिर्फ़ अपनी सारी फसल सुखने दी बल्कि अपने बैलॊं को भी बेच दिया।
बुंदेलखंड के अन्य हिस्सों की तरह ही टिकमगढ ज़िले ने भी भारी सुखे की मार झेली.लगातार पांचवे साल का सुखा. लेकिन इस बार के सुखे की हालत ये, कि वहां के लोगों ने इसे अकाल कहना शुरु कर दिया. खेती कैसे होगी इस बात की चिंता छोडिये, पानी कैसे पियेंगे इसके बारे में कुछ उपाय बताइए.सारे तालाब और कुयें सुख चले. जानवरों के चारा और पानी की कौन बात करे आदमी के पीने के पानी के लाले पड गये. बोरवेल में पानी का स्तर इतना नीचे चला गया कि वो किसी काम के नहीं.नया बोरिंग कोई क्यों कराए भला.इस बात की क्या गारंटी कि २५० फ़ीट पर पानी मिल ही जाये.
बंधा गांव के जुगल और मुरली ने भी ऐसा सुखा पहली बार ही देखा. जुगल और मुरलीधर के परिवार में कुल बारह लोग हैं. पांच एकड की खेती है इनके पास. इस खेती से सभी के खाने पीने की जुगाड हो जाता है और वक्त बेवक्त के लिये कुछ बचत भी हो जाती है. पिछले पांच सालों से अकाल पडने के बावजूद इन दोनों भाइयों को कभी किसी चिज की दिक्कत नहीं हुई.आराम से बेटिय़ों की शादी की और पूरे गांव को भोज भी दिया.लेकिन इस बार के सुखे ने तो जैसे कमर ही तोड दी. जुगल ने पांच एकड में गेंहूं की खेती की थी,लेकिन डेढ एकड की फ़सल तो सिंचाई ना होने से तुरंत ही सुख गयी.उम्मिद बची थी शेष उस साढे तीन एकड ज़मीन से, जो कुंए के बगल में था.वह कुआं ही जुगल और मुरलीधर के लिये अंतिम आस था. जुगल के गांव बंधा में दो बडा तालाब, एक छोटी तलैया और छ: कुंए हैं. पिछले पांच सालों में जब जेठ की तपिस सारे कुओं और तालाबों का पानी सोख लेती थी तब भी बंधा गांव के कुछ कुंए या हैंडपंपों में पानी बचा रहता था. पीने के लिये पानी की कमी कभी ना हुई.तनिक दूर से पानी ढो के लाना तो एक आम बात थी, लेकिन जब पानी ही ना हो तो क्या किया जाये...
इस साल के सुखे ने कुछ ऐसा कहर ढाया कि बांध गांव के सारे तालाब और कुंए सुख गये. धीरे धीरे बोरवेल और हैंडपंप भी जवाब दे गये.बचा सिर्फ़ जुगल और मुरली का कुंआ जिसमें पानी बचा था. इनके सामने एक बडी मुश्किल थी.या तो खेती बचाये या फिर गांव के लोगों को पानी पिलायें. एक तरफ़ बारह लोगों के परिवार के खाने की समस्या तो दूसरी ओर गांव के १५०० लोगों के लिये पीने के पानी की समस्या.बडी विकट दुविधा खडी थी इनके सामने.
३९५ परिवार वाले इस गांव में केवटों के सिर्फ़ ६० परिवार ही हैं. बाकी में ठाकुर, अहिरवार, नाई और पाल जातियों के परिवार हैं. बुंदेलखंड में जहां जाति के नाम पर लाशें गिरती हो वहीं के एक गांव में ऐसी समस्या खडी हो जाये तो क्या कहा जा सकता है...कठीन परिस्थितियों में हम जो निर्णय लेते हैं वही तय करती इंसान के इंसान होने के दावे को.इन दोनों भाइयों ने इस पर निर्णय लेने में देर नहीं की.अपना कुंआ खोल दिया पूरे गांव के लिये.
धीरे धीरे इनकी साढे तीन एकड में खडी गेहूं की फसल सुख गई. सुखते फसल को देखकर शुरु में जो आंसू निकलते थे, सुखती हुई फसल के साथ वो भी सुख गये.दो बैल थे. बीक गये. बडे अरमान से दो साल पहले थ्रेसर लिया था इस बार यूंही खडा रहा.
गांव के लोग आते, पानी ले जाते और दुआ करते.उनके चेहरे पर सुकून और खुशी के बाह्व देखकर इन दोनों भाईयों के चेहरे पर मुस्कान आती.जुगल से पुछिये तो कहते हैं," गांव के लोग पाने भर के ले जाते थे हम कैसे भगाते.उनके गोद के बच्चे पानी के लिये प्यासे थे और हम भगा देते? हमसे तो ये नही होना है चाहे मेरी ज़मीन ही क्यों ना बीक जाये.बैल के बिकने का दुख है लेकिन कोई बात नहीं भगवान ने चाहा तो फिर खरिद लेंगे."
बुंदेलखंड का पूरा इलाका गर्मी के मौसम में पलायन को अभिश्प्त है.पिछले साल मुरली भी दिल्ली गये थे. खेती का काम जुगल ने संभाल रखा था.मुरली से पलायन, सुखे और और उससी उपजे दर्द को पूछे तो कहते हैं," हां दिल्ली भी गये थे पिछली बार. बहुत कष्ट हुआ था. लेकिन जब मैने यहां लोगों को पानी के लिये बिलबिलाते हुए देखा तो मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ.बहुत कम था मेरा कष्ट इन लोगों के कष्ट से." चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान उभरती है लगता है उनके सामने दिल्ली में बिताये पल जिवंत हो उठे हैं. गांव वालों के चहेरे की मुस्कान की छाया मुरली के चेहरे पर भी दिखती है.

Thursday, April 10, 2008

सबसे सेक्सी जीव कौन?


आज मैं अपनी एक महिला सहयोगी के साथ कैंटीन में चाय पी रहा था।कुछ कुछ बातें हो रही थीं। तभी उन्होनें कहा, "पता है सबसे सेक्सी जीव कौन है?" मैनें खुब सारे जीवों के नाम गिनाये। तब मुस्कुराते हुए उन्होनें कहा ,"तुम नहीं समझ पाओगे। जानते हो सबसे सेक्सी जीव सांप होते हैं।" मुझे पसीना आ गया। सांप और सेक्सी। क्या नजरिया है देखने का। और वो बतायें जा रही थी। कितना लहरा कर चलता है। मतवालों की तरह। सेक्सी चाल। और उनके हाथ सांपों के चलने की नकल कर रहे थे। उसके शरीर पर जो धारियां बनी होती हैं कितनी खुबसूरत लगती है? जब उसपर सूर्य की किरणें पडती हैं तब क्या खूब दिखता है".


सच बताउं मुझे सांप का नाम सुनकर ही डर लग जाता है। सांप को देखने के बाद कभी उसके शरीर को ठीक से देखने की फ़ुरसत ही नहीं मिली। सर पर पांव रख कर भागे तो सुरक्षित जगह देखने के बाद ही रुके और ये मोहतरमा बता रहीं हैं कि सांप बहुत सेक्सी लगते हैं। उफ़...कल्पनाशिलता की हद देखिये।और चेहरा कैसा खील गया है इनका उसकी खुबसरती का वर्णन करते समय।


मालूम है मैनें एक बात बहुत शिद्दत से उनसे पूछना चाहा था ," यदि सांप जहरीला नहीं होता तो क्या आप उसे पालतू बना लेती? क्या उसमें ज़हर नहीं होता तब भी क्या वह आपको उतना ही रोमांच से भर देता।" मैं उनसे पूछ ना सका। लेकिन आपसे मैं पूछना चाहता हूं," क्या आपको भी सांप सेक्सी दिखते हैं?"

Friday, January 25, 2008

जूदेव के कुत्ते


क्या आप दिलीप सिंह जूदेव को जानते हैं? ये वही जूदेव हैं जो अपने छत्तिसगढ के कुछ इलाकों में अपने घर वापसी(पुनर्धमांतरण) कार्यक्रम को लेकर चर्चा में रहे हैं.इसके अलावा तहलका के स्ट्रींग आपरेशन में जूदेव को पैसा लेते हुए दिखाया गया था.उसमें जूदेव को यह कहते हुए सुना गया था ,
पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं.


जशपुर में जूदेवजी से मुलाकात हुई.रात में फोन किया तो मालूम हुआ जूदेव जी व्यस्त थे.उस दिन जशपुर में राज्य सरकार का और राज्य भाजपा का एक मिलाजुला कार्यक्रम था.दरअसल चुनावी मौसम में पूरे छत्तिसगढ में राज्य सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिये ३ रुपए प्रतिकिलो चावल बांटने का फ़ैसला किया है. सो पुरे राज्य के हर ज़िले में भाजपा के बडे बडे नेता मौजूद थे. इस योजना का शुभारंभ करने के लिये.गाडियों में भर भर कर लोगों को ज़िला मुख्यालय पहुंचाया गया था.सो उन्हें वापस भेजने का काम भी देर रात तक चलता रहा.

खैर सुबह में मिलने का समय तय हुआ.हम जशपुर में उनके घर पहुंचे.घर क्या था पूरा फ़ार्म हाउस था.या यूं कहें बगीचे के बीच में एक घर.जूदेव आये. उनके साथ उनके चार कुत्ते भी आये. हम बैठे. नाश्ता आया.बिस्किट और चाय के साथ. हमारा कैमरामैन कुछ कटअवेज़ बनाने लगा. बात शुरु हुई. अपनी मूछों पर ताव देते जूदेव कभी दोनों हाथों को फ़ैलाते कभी दोनों हाथों को सामने की तरफ़ लहराते.पूरा टशन.शानदार व्यक्तित्व के मालिक जूदेव की हर चीज में टशन.उनकी हर अदा सामने वाले को अह्सास कराती हुई कि मैं यहां का राजा हूं. कि किस तरह से उनके पिताजी ने सरदार पटेल को वो राज्य यूहीं दे दिया जिसे उन्होनें अपने तलवार के बल पर जीता था.

बातें होती रहीं. तभी उन्होनें अपने कुत्तों को बुलाया. चारों कुत्ते दुम हिलाते हुए उनके पास आ गये. दीलिप सिंह जूदेव ने कहा देखिये मैं एक खेल दिखाता हूं. उन्होनें बिस्किट का एक टुकडा कुत्तों की तरफ़ फेंका. उनका कुत्ता लपका. जूदेव ने तुरंत मना किया,"नहीं".और कुत्ता रुक गया. उन्होंने दुसरे टुकडे को दूसरे कुत्ते की तरफ फ़ेंका. वो भी लपका. उन्होनें कहा," नहीं". वो भी रूक गया. ऐसा उन्होनें हर कुत्तों के साथ दुहराया. और हर कुत्ता ऐसे ही उनकी बातों को माना.

वो लगे कहानी सुनाने. इन कुत्तों ने छत्तिसगढ की सरकार बनवाई है. जब चुनाव से पहले भाजपा के विधायकों को कांग्रेस ने तोड लिया था तो मैंने जश्पुर की रैली में इन कुत्तों का यह ड्रामा जनता को दिखाया. कहा ये चार पैर का जानवर मेरी बात मानता है और ये दो पैर वाले आपकी बात नहीं सुनते! आप इन दो पैर वालों को ठीक किजिये मैं उन्हें खराब करने वालों को संभालता हूं.फिर क्या था...सभी पूर्व विधायक चारो खानों चित.और रायपुर में कमल खिला.यह तो हमारे दुश्मनों ने हमारे खिलाफ़ साजिश कर दी.क्या हम मजाक में कोई शेर भी नहीं पढ सकते...पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं...

मैनें बडे ध्यान से सुना और देखा भी. सोचता रहा. क्या मायने हैं इन बातों के? जूदेव ने इशारों में क्या आज के नेत्ताऒं के उपर छिंटाकशी की? शायद नहीं शायद हां...मुझे समझ में नहीं आया ...आखिर जूदेव किस ओर इशारा कर रहे थे? आखिर वो किसको कठघरे में खडा करना चाहते थे...आपको कुछ समझ में आये तो हमें भी बतायें...

Wednesday, December 26, 2007

मोदी जीता था मोदी जीता है और मोदी जीतते रहेंगे


आज गुजरात में मोदी की जीत पर तमाम बातें हो रही हैं. तथ्यों की चीर फाड हो रही है. कई कारण गिनाये जा रहे हैं. कोई सोनिया गांधी के मौत के सौदागर वाले भाषण को दोषी बता रहा है कोई गुजरात के विकास के माडल को जिम्मेदार ठहरा रहा है.कोई कुछ और.लेकिन एक बात मैं यहां जोडना चाहता हूं कि जब तक हम छद्म धर्मनिरपेक्षता का लबादा उतार कर नहीं फेकेंगे इस देश में मोदी पैदा होते रहेंगे और चुनाव भी जितेंगे.वो भी पुरे ५० फ़िसदी वोट के साथ.

Monday, December 10, 2007

घर भी छूटे और घाट भी !

मुहल्ले में जाति के उपर चल रही बहस के बीच में मैने भी कुछ कहा था एक पत्र के माध्यम से. इसके बाद दिलीप भाई ने उस पत्र क जवाब भी दिया.उस पर मुझे कुछ कहना था. मैने उसे सीधे अविनाश दादा के पास भेज दिया. हालांकि उन्होनें उसे पोस्ट तो नहीं किया हां मोहल्ले पर लिखने को आमंत्रित जरुर किया. मैं उसी बात को आपके सामने रख रहा हूं जो मैं वहां कहना चाहता था. यह पोस्ट मोहल्ला पर भी छप चुका है.

बात उस समय कि है जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फ़र्स्ट इयर का स्टुडेंट था. सब कुछ नया था मेरे लिये.नये लोग, नयी बातें और वहां के छात्र राजनीति को करीब से देखना.सब कुछ नया था. एक गांव से निकल कर आया था मैं. घर में राजनीति की बातें होती रहती थी इसलिये नेताओं के नाम और उनके कामों के बारे में सुन रखा था. इसलिये राजनीतिक बातों में रुची थी.लिहाज़ा मैंने यह निर्णय लिया था कि हर जलसों में जाउंगा.वहां उनके नेताओं को सुनुंगा.

दो तीन माह हुए थे वहां गये हुए.पता चला कि सीताराम येचुरी आने वाले हैं. मैं भी वहां गया.खुब बातें हुई. जाति,धर्म,वर्ग और समाज से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भी जम कर बहस हुई. सच में पहली बार मैंने एक ऐसे वक्ता को सुना था जिसने मुझे प्रभावित किया था.मेरी सोच को भी. तभी बहस वर्ग और जाति पर केंद्रित हुई.येचुरीजी कह रहे थे...हमें जाति और वर्ग को मिला देना होगा. जब तक हम जाति और वर्ग को मिला कर नहीं लडेंगे तब तक वर्ग को नहीं खत्म किया जा सकता...बारी आयी सवाल जवाब की.मेरा सवाल था," यह काम हम कैसे करेंगे? मैं जाति से ब्राहण हूं .इस वर्ण व्यवस्था में सबसे उपर हूं.और मैं गरीब हूं . इतना कि दो जून की रोटी मैं बडी मुश्किल से जुटाता हूं.मेरा दोस्त है गांव में मेरे ही जैसा पैसा कमाने वाला एक दलित.हम साथ में खेतों में काम करते हैं. दोपहर में साथ में बैठकर रोटी खाते हैं.यदि आप लडाई को वर्ग से हटाकर वर्ण पर लायेंगे तो आखिर मैं अपने ही जाति के एक आदमी को कैसे मार सकता हूं.( मैं बात को एकदम इक्स्ट्रीम पर ले गया था).क्योंकि कोई मेरा चाचा है कोई भैया है कोई दादा है. आर्थीक हैसियत भले ही मेरी वैसी नहीं है लेकिन समारोहों में उन घरों में उतनी ही इज़्जत मिलती है. हां अगर बात सिर्फ़ वर्ग की हो तो मैं अगली पंक्ती में खडा मिलुंगा लडने के लिये. क्योंकि मेरे अंदर भी गुस्सा है. येचुरीजी ने सिर्फ़ एक लाईन में जवाब दिया, "हमें यही करना होगा और अपनी मानसिकता बदलनी होगी."

मैं दुबारा सवाल करना चाह्ता था लेकिन, समय की कमी थी. एक बात जो मैं वहां पुछना चाह्ता था वो यह था," आप क्या चाहते हैं कि हम ना घर के रहें ना घाट के. हम अपने चाचा, दादा और भैया के खिलाफ़ लडें वर्ग के नाम पर.और अचानक एक दिन पता चले की रणवीर सेना और एम सी सी की मारकाट में गांव के सारे सवर्णों के घर में आग लगा दिया गया.और मेरा परिवार उस आग की भेंट चढ गया.( यह सब होगा जाति के नाम पर)...

दिलीप भाई हम तो प्रतिरोध के स्वर के साथ अपना स्वर मिलाने के लिये तैयार हैं.लेकिन उसकी कीमत क्या होगी? कौन हमें भरोसा दिलायेगा कि जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा. कौन हमें भरोसा दिलायेगा कि तब बात सिर्फ़ योग्यता के ही आधार पर की जायेगी.

दिलीप भाई मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि उत्पादन संबध में परिवर्तन हुआ है.बाज़ार और वैश्वीकरण ने जाति के ज़हर के प्रभाव को धीमा किया है.लेकिन हमें तो जो प्रतिरोध के स्वर सुनाई देते हैं वहां तो बाज़ार विरोधी बातें कानों में पडती हैं.आखिर इस तरह के अंतर्विरोधों का हम क्या करें. हम उन ताकतों से कैसे निपटें जो खडे तो होते हैं वर्ग आधारित समाज की रचना करने को लेकिन उनकी सारी ताकत अपना स्वार्थ साधने में खर्च हो जाती है. हो सकता है कि यह बहुत छोटी बातें हैं.लेकिन मैने यह देखा है कि किस तरह से दो ठाकुर परिवारों में झगडा होता है और एक परिवार का बडा लडका एम सी सी को फ़ंड करता है क्योंकि दुसरे परिवार का रणवीर सेना से अच्छे ताल्लुकात होते हैं. हमें क्यॊंकर भरोसा हो ऐसे प्रतिरोध पर.

दिलीप भाई जातीय दंभ और अभिमान की बातें तो बेमानी है.सच्चाई यह है कि हम अगर जाति को खत्म करने की बात करते हैं तब भी एकबार सामने वाला सोचता है कि क्या ये सच बोल रहा है? तब हमें अपनी बात बहुत ही जोरदार तरीके से रखनी होती है.उससे भी ज्यादा जोरदार तरीके से जो इस व्यवस्था का शिकार रहा है. हमें हर बार अपनी आवाज़ उंची करनी पडती है. कुछ ठीक उसी तरह जैसे इस देश के मुसलमानों को हर बार देशभक्त होना साबीत करना पडता है.यानि जब आप पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हों तो उनसे ये उम्मीद की जाती है कि वो और ज़ोर से वही नारा दुहराये.आवाज़ कमज़ोर पडी नहीं कि उन्हें शक की निगाह से देखा जाता है.

तो लीजिये ...मैं अपनी आवाज़ उंची करते हुए और बहुत ही जोरदार तरीके से यह कहना चाहता हूं कि मैं जाति व्यवस्था का घोर विरोधी हूं.मैं हर काम का कद्र करता हूं.मेरी निगाह में कोई काम बडा नहीं कोई काम छोटा नहीं. मैं उस व्यवस्था पर थूकता हूं जो दो इन्सानों में फ़र्क करती है.

गाली देने नही आता. और ...इससे ज़्यादा जोरदार तरीके से मैं अपनी बात रख सकूं इतनी मजबूत नहीं है मेरी लेखनी. और कोई तरीका हो तो आप बतायें ...जिससे मैं साबीत कर सकूं कि मुझे अपनी जाति को लेकर रत्ती मात्र भी अभिमान नहीं है.आप निकालिये जाति की शव यात्रा. हम सबसे आगे आगे नाचते मिलेंगे.

Saturday, December 8, 2007

दुबेजी का पत्र

मुहल्ले में बहुत दिनों से एक दुबेजी पर चर्चा हो रही थी.वो दुबे जी लैट्रीन साफ़ करते हैं.मुझे भी मिल गये.उन्होनें मुझे मुहल्ले वालों के नाम एक पत्र दिया. कहा कि इसे सही जगह पहुंचा दें.मैने उस पत्र को मुहल्ले के लोगों तक पहुंचा दिया है.लेकिन आप भी उसे देख सके इसलिए दुबे जी की अनुमति से यहां भी छाप रहा हूं.

सब लोगन को प्रणाम. मैं दुबेजी बोल रहा हूं. वही दुबेजी जिसे दिलीप भाई ने लैट्रीन साफ करते देख लिया था.मैं पहले अपना पुरा परिचय देना चाहता हूं.इसके बाद और बात होगी.मेरा नाम रामानंद दुबे है. मेरा घर हुआ गोरखपुर में चिल्लूपार.अब गांव मत पुछियेगा. हाथ जोडते हैं.

आपलोगों को मैं यह पत्र नहीं लिखता लेकिन आपलोग हमारे उपर इतना चर्चा कर लिये कि रहा नहीं गया.अविनाश भाई तो असली नारद हैं.उकसा देते हैं फिर खेल देखते रहते हैं.हां तो... मैं किसी पर कोई आक्षेप नहीं लगा रहा.मैं क्या लगाउंगा आक्षेप? मैं कुछ कहना चाह रहा था इसलिये सामने हूं.

मेरे गांव में २५ घर है दुबे लोगो का.दुबे टोली कहते हैं आज भी...ठीक वैसे ही जैसे ७० घर दलितों वाले मुहल्ले को चमटोल.गांव के दखीन में है यह मुहल्ला.ग्वाल लोग भी हैं १० घर.ग्वालों का टोला कहते हैं जहां वो रहते हैं.उनके घर के पास लंबा चौडा मैदान है.और बाकी २० घर में सब जाति है.हमारे गांव के पुरब के पोखरे पर काली मां का मंदिर है.उसमें जेठ महिने में काली मां की पूजा होती है.पहले जब देवी आती थीं तो दुबे बाबा (पूरा गांव इसी नाम से जानता था)के शरीर पर आती थी.हम लोग छोटे थे तब.लेकिन जब थोडा बडा हुआ तो देखा कि अब काली माता गांव के बासुकी भैया(वो चमटोल में ही रहते थे)पर आती थी. हमलोग जाते थे उनके पैर पकडते थे. यह डर भी साथ कि कहीं काली मां नाराज़ ना हो जाये. वो नीम के छरका से हमें मार कर आशिर्वाद देते थे. जब पहली बार मैंने उन्हें उस रूप में देखा था तो दंग रह गया. दिमाग में काली मां की तस्वीर बस गयी. इसके बाद वो किसी काम से हमारे घर के पास आये थे. हमने दौड के उनका पैर छुआ था. वहीं खडे थे हमारे बडका बाबुजी. कस के डपटे थे बासुकी भैया को. "का रे बसुकिया बाभन के बच्चे से पैर छुआता है रे?".."मालीक"...कुछ नहीं बोल सके थे वो और चले गये थे.हमे समझ में आ गया कि चमटोल में रहने वालों के पैर नहीं छुआ जाता. इसके बाद तो जब कहा गया तो मैने पैर छुआ ...नहीं तो बस ऐसे ही निकल गये...धीरे धीरे हुआ यह कि आठवी तक जाते जाते हमहीं को गांव के कई लोग पांव लागो पंडीजी कहने लगे. उसमे बासुकी भैया भी थे. अब मैं उनको भैया नहीं कहता था.

आठवीं के बाद नहीं पढ पया. घर में पैसे नहीं थे. मेरा एक बचपन का दोस्त था घुरहुआ.उ सका असली नाम था घुरे राम. पता नहीं कब बंबई चला गया था. वहां से आता तो लक दक लक दक कपडा,जूते और लाल मोजे,बढिया चेक वाली लुंगी पहन कर घुमा करता. हमारे पास था वही एक पुराना बंडी और जज्मान के यहां से मिली हुई धोती. .घुरहुआ हमको बांबे की कहानी सुनाता तो हम बस सुनते रह जाते. इसी बीच शादी हो गयी. शादी हो गयी तो बच्चे भी हुए. तीन लडकियां और दो लडके. बडी लडकी जब १२ साल की हुई तो चिंता सताने लगी. आमदनी अठ्ठनी और खर्चा रुपैया की जगह आमदनी चवन्नी और खर्चा दो रुपैया हो गया था. कभी कभार जज्मान के घर शादी व्याह होता था तो कुछ पैसा हाथ में आता था. लेकिन जज्मानी भी तीन भाईयों में बंट गयी थी. मुश्किल से खर्चा चलता था. उम्र के ३१ वें पडाव पर आकर बडा कोफ़्त होता था. जमीन थी नहीं कि खेती - वेती करते. लगातार परेशान रहते थे कि कैसे क्या करें? इसी सोच में दिन कटता था. सारे बाल सफ़ेद हो गये और शरीर गल कर आधा.( दिलीप भाई ने शायद गौर नहीं फ़रमाया.शायद वो यह सुनकर और देखकर ही हैरान परेशान रह गये कि दुबेजी लैट्रीन साफ कर रहे हैं.अरे भैया सब करना पडता है.)

तीन साल पहले होली में घुरहुआ फिर गांव आया. साथ में भंग छनी. होरी गाया गया. घुरहुआ नगाडा के थाप पर बडा कर्कश नाचता है. हम नाचे... गाये....पर्व मनाकर खाली हुए तो बात शुरु हुआ.हमारा हाल देखकर बोला,"भैया हियां का रखा है मेरे साथ बांबे चलो वहीं काम करेंगे. ठीक ठाक पैसा मिल जाता है".घर में बाल बच्चों को छोडकर बांबे कैसे जायें? बडा मुश्किल सवाल था. घरवाली से बात किये तो कहा कि जवान लडकी सर पर खडी है और आप कहते हैं बांबे कैसे जायें! मैं घर संभाल लूंगी आप जाइये. मैं कुछ पैसे लेकर बांबे चला. वहां गया तो उसी के घर पर रुका. घर क्या था ...एक कमरा था ..उसको सब खोली कह रहे थे. एक कमरे में चार लोग रहते थे. पांचवा था. अगली सुबह मैं घुरहु के साथ उसके काम वाली जगह पर गया. वो वहां का सुपरवाईजर था. दस लोग उसके अंडर में काम करते थे. ठेका जैसे काम होता था. पुरे आफ़िस की साफ सफ़ाई का ठेका किसी कंपनी को मिला था. उसी कंपनी में घुरहुआ काम करता था. हमें बताया गया कि यही काम होता है. क्या ना करता? छाती पर पत्थर रखकर मंजूर किया काम करना. आपको क्या लगता है हमको गुस्सा नहीं आया अपने आप पर...मन तो करता कि कहीं डूब मरें लेकिन बडकी का फोटो आंख के सामने नाच जाता था. कैसे करेंगे उसका ब्याह?
हमने घुरहुआ से वादा लिया कि वो किसी से नहीं बतायेगा कि मैं क्या काम करता हूं. तो भला कौन मेरी बडकी से ब्याह करता. कौन देता अपनी लडकी मेरे घर में. गांव वाले थुकते वो अलग. गांव में घुरहुआ और मेरी घरवाली को छोडकर किसी को नहीं पता मैं क्या करता हूं.

पिछली गरमी में घर गया था तो मेरे एक जजमान के यहां शादी थी. मैं गया अपने नये कपडे पहन कर. जजमानी ज्यादा मिली. सब बोला कि पंडीजी खाली इसी खातीर बांबे से हियां आये हैं. भेखे भिख मिलता है मेरी माई कहती थी. एक लडका भी देख आया बडकी के लिये. उसके लिये पायल बनवाया है...उसको पहन कर चलती है तो रुन झुन रुन झुन पूरा गर गुंजता रहता है.बडा सकून मिलता है करेजे को.उससे ज्यादा सकून कभी नहीं मिला.
आज सबसे बडा सवाल मेरे सामने यही है कि मेरे बच्चे ठीक से रहें...अपना काम पूरा करूं .बच्चों की शादी वादी कर दूं. कुछ पैसे बचे तो फिर गांव जाकर अपना काम धाम करूं. दिलीप भाई पता नहीं आपने मुझे कहां देखा. बांबे में या दिल्ली में. मैं ऐसे अपने ही जैसे कई और लोगो को जानता हूं जो अलग अलग तरह का पेशा कर रहे हैं.कोई दुबे है, कोई तिवारी है, कोई चौबे, पांडे, शुक्ला और ओझा भी. ये सब लगे हैं साफ़ सफ़ाई में दर्जी के काम में यहां तक की हलवाई और मोची भी बने हैं. लेकिन एक बात मैं और कहना चाह रहा हूं ...दिलीप भाई महिलायें तो तैयार ही नहीं बल्कि वो अपना काम भी कर रही हैं ...आप जरा पुरुषों को आगाह किजिये ...वो समझने के लिये तैयार ही नहीं दिखते.

आप सबका
रामानंद दुबे