Sunday, March 25, 2007

दोपहर के अलसाये पल

तुम्हारी समँदर -सी गहरी आँखों में,
फेंकता पतवार मैं, उनींदी दोपहरी में -
उन जलते क्षणों में, मेरा ऐकाकीपन
और घना होकर, जल उठता है - डूबते माँझी की तरह -
लाल दहकती निशानीयाँ, तुम्हारी खोई आँखों में,
जैसे "दीप ~ स्तंभ" के समीप, मँडराता जल !

मेरे दूर के सजन, तुम ने अँधेरा ही रखा
तुम्हारे हावभावों में उभरा यातनाओं का किनारा ---
अलसाई दोपहरी में, मैं, फिर उदास जाल फेंकता हूँ --
उस दरिया में , जो तुम्हारे नैया से नयनों में कैद है !
रात के पँछी, पहले उगे तारों को, चोंच मारते हैं -
और वे, मेरी आत्मा की ही तरह, और दहक उठते हैँ !
रात, अपनी परछाईँ की घोड़ी पर सवार दौड़ती है ,
अपनी नीली फुनगी के रेशम - सी लकीरों को छोडती हुई !
- पाबलो नेरुदा

9 comments:

Arunoday said...

Dubeyji....waise aap aur aapke vichar kafi nek hain...magar agar aap thoda jyada mehnat karenge toh mahanta ka parcham lehra payenge...

अनिल दुबे said...

अरुणोदय जी, आपकी सलाह के लिये धन्यवाद.लेकिन मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाह्ता हूं.मैं महान बनने की चाह्त कत्तई नहीं रखता.

manjit said...

कविता तो निस्संदेह अच्छी है, क्योंकि नेरूदा की है। मज़ा तो तब आए जब आपके ब्लाॅग पर कुछ ऐसा कड़वा-तीता एकदम खट्टा कसैला टाईप का कुछ आए, जिससे जी मिचलावे और उल्टी करने का मन करने लगे। एक कविता पढ़ी थी याद नहीं किसकी लेकिन उधार है .... नाचो शंकर, कै-लाश पर नाचो... मुमकिन है कि मुक्तिबोध की हो. अस्तु. शुभकामनाएं

Manish said...

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Arunoday said...

Mitra aisa hi chahat ki baat humne nahi ki thi...maine kaha tha ki tum mahan ho...kami har insaan main hoti hai...mujhme bhi hai...tum bhi alag nahi ho...thodi kosis se mahanta ke shikhar pe pahunch jaoge...tumhara mitra..

Manoj said...

Adarniya Dubey ji ummed hain kavitaon ke alawa au bhi nek vichar jo ki lekhon ke roop main ho pashane ko awashya milengeee .. Kuch gaon ki asli tasveer par awashya likhen chunki aapka gaon main pichlen do sallon main kafi acha bhraman raha hain...

kumar said...

abe duffer, kitna complex hindi likhta hai.mana tere knowledge ka base wide hai,magar mere jaise kam gyan wale ke liye bhi kuch simple hindi ya english main likha karo.

anyworld said...

aapke vichar kafi nek hain...
keep it up mate
cheers

Arvind chaturvedi said...

भोर भई..दिल्ली ने गमीॻ की तपिश देख ली है तो बारिश की फुहारों का मौसम भी देख रही है। चुनावी रणभेरी भी शाम ढ़लते बज चुकी है। बौराएं आम के पेड़ फलों से लकदक भरे पड़े है। लेकिन इस ढ़ाबे का स्वाद नही बदला.....